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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



गर हम न होते


डॉ० अनिल चड्डा


 
तुम क्या करते गर हम न होते,
खुश ही रहते अगर गम न होते।

होती क्यों खराब जमाने की हवा,
लूटने वालों के जो परचम न होते।

ख्वाब नींद में ही क्यों आते हैं सदा,
जागते हुए तो ये भरम न होते।


इंसां को इंसां ही तो समझा जाता यहाँ,
बाँटने वाले दुनिया मे ये धर्म न होते।		 
 

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