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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



बेटियाँ


आकांक्षा यादव


अपनी जवानी के दिनों में कुलवंत सिंह ने बेटों को कोई तकलीफ नहीं होने दी। उनकी हर फरमाइश पूरी की। उनके दो बेटे थे। पडोसियों और रिश्तेदारों से बहुत गर्व के साथ कहते कि जरूर पिछले जन्म में कुछ अच्छे कर्म किए थे कि ईश्वर ने उन्हें दो-दो बेटे दिए। वह बार-बार अपने पड़ोसी राधेश्याम को सुनाते रहते, जिनके पास तीन लड़कियाँ थीं। वक्त बीतने के साथ कुलवंत सिंह के दोनों बेटे अच्छी नौकरी पाकर विदेश में सेटल हो गए, वहीं राधेश्याम ने तीनों बेटियों की शादी कर मानो गंगा नहा लिया हो। इस बीच कुलवंत सिंह की तबियत बिगड़ी तो अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। उनकी पत्नी अकेले अस्पताल में पड़ी रहीं, पर बुढ़ापे में कितना दौड़तीं। कुछ दिन बाद कुलवंत सिंह का हाल-चाल लेने राधेश्याम अस्पताल पहुँचे तो साथ में बेटी भी थी। ”......अरे ! आपके बेटे नहीं दिख रहे? सब ठीक-ठाक तो है न?” ”.......बेटों को संदेश तो भेजा था, पर छुट्टी न मिलने की समस्या बताकर उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। अकेले कितनी भाग-दौड़ करूँ?” ”........हम हैं न आंटीजी, आप चिंता मत कीजिए। दवाओं के लाने से लेकर फल व खाना लाने तक का जिम्मा मेरा।‘‘ यह राधेश्याम की बेटी की आवाज थी। ”मुझे माफ कर देना राधेश्याम। बेटियाँ तो बेटों से भी बढ़कर हैं।”.........इतना कहकर बीमार कुलवंत सिंह फफक-फफक कर रो पड़े थे।


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