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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



कुण्डलिया


अर्जित पाण्डेय


  
छैल छबीले साँवरे ,बचै न इनसे कोय
तान छेड़ मन हरत है ,जो सुमिरै सब खोय
जो सुमिरै सब खोय,नयन छलके अश्रु धारा
तरसे पावन प्रेम,समूचा जग यह सारा
मन मोरा खो जाय,देख दो नैन नशीले
तापस चित्त ढूँढत,कहाँ हो छैल छबीले


प्रेम समर्पण जान कर,साथ न देता कोय
चोरी छुपे मिलत नयन,जब जग सारा सोय
जब जग सारा सोय, करें सब प्रीति की बात
साथ छोड़ के बीच ,पूछत नाम जात पात
टूटे सपने सकल,बिखरे खुशियों का फ्रेम 
किससे निभे  रिश्ते,कौन निभावत अब प्रेम 	 
 

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