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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



मैं तभी बोलता हूँ


सुशील शर्मा


  
मुद्दई के पक्ष में,
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मैं तभी बोलता हूँ
जब मुझे लगता है
मेरे मौन से
बेहतर होंगे मेरे शब्द
#
मैं सहानुभूतियों को
शुभ मुहूर्त देखकर ही
निकालता हूँ बाहर
बन्द तिजौरी से
नाहक ,
अनायास कोई 
बिना हक के
न छीन ले मुझसे 
बचे -खुचे 
प्रेम-दया के भाव....
#
यूँ तो मुझे
बार-बार काठ की हांडी
चढाने वालों से होती है नफरत 
अलग -अलग खिचड़ी
पकाने वालों से होता है कोफ्त
जी उचटा रहता  है
भगोड़ों से
चाहे वे भागे हों 
प्रेम की  असफलता में ,
कर्ज की देनदारी में,
धोखाधड़ी,गद्दारी में 
या सजायाप्ता 
मुकदमे की खौफ से 
#
ये जानते हैं ,
इस मुल्क में 
अर्जियां लगाने की है छूट 
कहीं भी ,कभी भी 
माफी-नामा लिख दो 
सुनवाई मुद्दई के पक्ष में,
हो ही जाती है 
देर-सबेर 
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