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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



पैदल चलने वालों की


सतविन्द्र कुमार राणा


                          
साँसें किस्तों पर चलती हैं
शान दिखाने वालों की
पर देखो चांदी ही चांदी 
पैदल चलने वालों की।

कुछ लोहा जो घर में जोड़ा
जिसका इंजन भारी है
बिना तेल के कब चलता है
देखो तो लाचारी है
तेल पहुँच से आगे जाता
पीछे रहती लारी है
किया भरोसा इस पर जिसने
वो ही तंग सवारी है

शामत आती बार-बार अब
सिर के थोड़े बालों की
पर देखो चांदी ही चांदी
पैदल चलने वालों की।

लेट मारते सारा दिन जो
तन फैला ही जाता है
इस कोने या उस कोने में
कोई शूल चुभाता है
भारी भरकम ठेले से को
वह ठेल न पाता है
पेट गोल होकर आगे को
नज़र दूर से आता है

दुनिया देखे हँसी उड़ाए
इन लटकी फुटबालों की
पर देखो चांदी ही चांदी
पैदल चलने वालों की।

महँगाई का दौर चला है
पैसा खूब बचाना है
बीमारी से हां हम सब को
दूरी सही बनाना है
अगली पीढ़ी की खातिर भी
कुछ तो छोड़े जाना है
साइकिल थाम भूल कर गाड़ी
कुछ पैदल तब जाना है

इन सब के ही साथ जिंदगी
होगी बाला-बालों की
होती है चांदी ही चांदी
पैदल चलने वालों की।

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