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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



जन्नत से प्यारा


कवि राजेश पुरोहित


                         
हिमगिरि का ताज सजाये जो।
सबकी पहचान बताये जो।।
स्वर्ण सी चमक दिखाये जो।
कितना प्यारा लगता है जो।।


ऋषि मुनियों की खान है जो।
सबके दिलों की जान है जो।।
हम सबका स्वाभिमान है जो।
जन्नत से प्यारा लगता है जो।।

 हरियाली की ओढ़े चुनर जो।
समृद्धि के गीत गाता है जो।।
खेतों और खलिहानों वाला।
कलकल धुन सुनाता है जो।।

नदियों झीलों तड़ाग वाला।
ऊँचे ऊँचे सुन्दर टीले वाला।।
बालू के रेतीले धोरों वाला।
कितना रम्य रिझाता है जो।।

गढ़ कोठे कंगूरों वाला है जो।
राजा रजवाड़ों वाला है जो।।
संस्कार संस्कृति वाला है जो।
विश्वगुरु भारत कहाता है जो।।
 

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