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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



छोटी सी गुड़िया


कवि जसवंत लाल खटीक


  
चाँदनी रात में तारो को , देखके सोचूँ ,
       काश ! कोई सितारा मेरे आँगन में उतरता ।
मेरे घर में आये एक छोटी सी गुड़िया ,
          मेरा आँगन भी आसमान सा निखरता ।।

अब तो खुदा !  सुन मेरी पुकार ,
                   मेरे घर भी एक फ़रिश्ता उतार ।
मुझे छोटी गुड़िया का दे वरदान ,
                ताकि दे सकूँ उसे ढेर सारा दुलार ।।

बेटे की ख्वाहिश तो सब करते है, 
               मुझे तो बस एक छोटी गुड़िया दे दे ।
बेटे जायदाद का बटवारा करते है, 
              शायद ! बेटी दवाई की पुड़िया देदे ।।
                 
बहुत समझदार बनके जिया हूँ ,
                  बच्ची के संग मै बच्चा बन जाऊं ।
आजकल की दोतरफी दुनिया में ,
               बच्चों की तरह मै सच्चा बन जाऊ ।।

नन्ही प्यारी और छोटी सी गुड़िया , 
                    कोख में ही मार देती ये दुनिया ।
मुझको भी गुड़िया का दीदार करादो , 
           क्यों सीमीत हो जाती इनकी दुनिया ।।

नन्ही व छोटी सी हो मेरे गुड़िया ,
                   कंधे पर बस्ता स्कुल में जाये ।
हाथ में लेके नमकीन की पुड़िया , 
               डाल के झप्पी, हरदम मुस्कुरायें ।।

मेरा एक ही सपना है अब ,
                    मेरे घर में भी लक्ष्मीजी आये ।
 रखे अपने कोमल से कदम और ,
             "जसवंत" के घर को जन्नत बनाये ।।

 

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