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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



पत्थरों को क्या कहें


हरिहर झा


  
शर्म से गर्दन झुकी, 
पत्थरों को क्या कहें

बौछार फैंकी, 
छेड़ कर, मुस्का रहा छलिया
कीचड़ उछाला, ताव से  
चटखा रहा  कलियाँ
पाषाण दिल चुपचाप 
काटे, चिकोटी लोफर 
स्थिर व्योम ताके है, 
घुमन्तू बादल का डर
  
तारे लो बुझ गये 
क्रंदन स्वर गूंज रहे। 

तमस की घुसपैठ 
आतंकी लगाये घात 
रौंद फूलों  को, 
निकाली गंध की बारात
पिशाच की वृत्ति जो उभरी  
हाय! गँदलापन
संघर्ष, सिसकी में 
घायल हो गया तन मन 
भय लगे हैवान से 
हाथ फिर किसका गहे? 

टूट  गई हड्डियाँ,  
चटख  जाती पसली 
चीख गूँजी गगन में,  
तूफान था असली 
कोतवाली झूमती, 
सरक जाते नोट 
तराजू में जंग, 
कुछ थी वज़न की खोट        

पतवार कश्ती को डुबा, 
जलधार में  बहे।  
 

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