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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



डर लगता है


डॉ० अनिल चड्डा


 
और तो कोई बात नहीं
तुम्हारी न से डर लगता है
जी तो चाहता है
तुम्हारे पास बैठूं
तुमसे दो बात करूँ
बातों ही बातों में
तुमसे दिल की कहूँ
बस तुम्हारी न से
डर लगता है
जी तो चाहता है
तुम्हारी गर्म सांसें
महसूस करूँ
तेरे स्पर्श को 
दिल में उतार लूँ
बस तुम्हारी न से 
डर लगता है
तुम्हारा हाथ पकड़ कर
साथ चलूँ
जिंदगी भर 
जिंदगी के रास्तों पर
तुम्हारा संग करूँ
पर तुम्हारी न से
डर लगता है		 
 

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