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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



इक मौन-निमन्त्रण तो दे दो


डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'


                          
जलने को परवाना आतुर, आशा के दीप जलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।
 
मधुवन में महक समाई है, 
कलियों में यौवन सा छाया,
मस्ती में दीवाना होकर, 
भँवरा उपवन में मँडराया,
मन झूम रहा होकर व्याकुल, तुम पंखुरिया फैलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।
 
मधुमक्खी भीने-भीने सुर में, 
सुन्दर राग सुनाती है,
सुन्दर पंखों वाली तितली भी, 
आस लगाए आती है,
सूरज की किरणें कहती है, खुलकर कलियों मुस्काओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।
 
चाहे मत दो मधु का कणभर, 
पर आमन्त्रण तो दे दो,
पहचानापन विस्मृत करके, 
इक मौन-निमन्त्रण तो दे दो,
काली घनघोर घटाओं में, तुम बिजली बन कर आओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।

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