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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



तो भी क्या!


डॉ० अनिल चड्डा


 
मन ने जो था चाहा, वह मिल ही जाए,
तो भी क्या!
आस नहीं भर पाए जीवन में
तो भी क्या!

हर लम्हा लगे मुश्किल सा,
हर लम्हा हो जाए आसां भी,
सोच-सोच कर ही घुलना,
फितरत है ये नादाँ सी,
गर लम्हे ऐसे आ जाएं,
तो भी क्या!

बर्बादियों का रोना,
रोने से क्या है मिलना,
राह की खुशी को,
किस कारण कम है करना,
कुछ गम मिलें गर हमको,
तो भी क्या!		 
 

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