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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



दोहे


शुचि 'भवि'


                          
1
हे माँ वीणा वादिनी,दे मुझको वरदान। चले निरंतर लेखनी, जब तक है 'भवि' जान।।
2
बस्तर सा सुंदर नहीं,ज़िला मगर ‘भवि’ काश। ख़त्म वहाँ से हो सके, राजनीति का पाश।।
3
चाहे हो सौ साल की, या कोई नादान। औरत केवल भोग का, होती है सामान।।
4
सबसे हँसकर भी ज़रा, मिला करो कम यार। ठीक नहीं है आजकल, बहुत लुटाना प्यार।।
5
आशीषों से हो भरे,जीवन के सोपान। हार और ‘भवि’ जीत क्या, बनो नेक इंसान।।
6
सीधे सच्चे को कहाँ,मिलता अब सम्मान। दुम जिसकी जितनी हिले,उसका उतना मान।।
7
बड़ी दुखद ये बात है, बस मतलब का साथ। मतलब निकले भूलता, बायाँ दायाँ हाथ।।
8
चाटुकारिता से बड़ा, हुनर नहीं है आज। मंच-पोस्ट ग्रुप हर जगह,भवि इसका ही राज।।
9
रंग- बिरंगे फूल हैं, खिले हुए चहुँ ओर। धरती के इस रूप पर,मन नाचे बन मोर।।
10
ईश तुम्हारे साथ हैं , करते रहो प्रयास । जीवन में कितने मिलें,तुम्हें विरोधाभास।।
11
नाकाफ़ी इस दौर में,'भवि' जीतोड़ प्रयास। चाटुकारिता के बिना,रखो नहीं कुछ आस।।
12
सोचो भवि है मतलबी,कितना वो इंसान।। मतलब में इंसान को,बोले जो भगवान।।
13
बातों से उस शख़्स की,कैसे हो पहचान। जिसके मन में कंस है,होंठों पर भगवान।।
14
ईश कहे जो आपको, तो समझें ये आप। उसके मन में है भरा, निश्चित कोई पाप।।
15
बूँद स्वाति की जिस तरह, ले लेती है सीप। धारण कर लो ईश गुण,नहीं रहोगे चीप।।
16
श्रेष्ठ हुए हैं जन्म से,कौन जगत में लोग। कर्मों से ही श्रेष्ठता, का बनता संयोग।।
17
जीवन जब नीरस लगे,बोरिंग और तबाह। याद करो भवि ईश को,वो देगा उत्साह।।
18
मन हो पावन आपका, रौशन आँगन-द्वार। ईश करे घर में सदा,’भवि’ हों ख़ुशियाँ-प्यार।।
19
मन मयूर सा झूमता,सुन क़दमों की चाप। यादों में चुपचाप से ,जबसे आये आप।।
20
नाम रटो तुम ईश का,बेशक सुबहोशाम। लेकिन सब बेकार है, बिना किए सद्काम।।
21
हद से हद मानव यहाँ, रह सकता सौ साल। छोड़ो उसके बाद के,सपनों का जंजाल।।
22
जो भी करना आज हो,कर ले उसको आज। वरना तेरा शेष कुछ, रोज़ बचेगा काज।।
23
भवि अपनी मासूमियत, रखो सुरक्षित यार। तुम पर हो सकता नहीं, कभी उम्र का वार।।
24
केवल मतलब के समय,जो पूजे भगवान। पीड़ित दुख-दारिद्र्य से,रहता वो इंसान।।
25
कापी भी जँचती नहीं, आता है परिणाम। इम्तिहान क्या आजकल, ‘भवि’ क्या है अंजाम।।
26
अपने दिल से पूछिए, क्या उसको दरकार । उसे प्यार की प्यास है, या बस कारोबार।।
27
टेढ़े जग में तोड़ता, मानव का वो दर्प। बिल में जाने के लिए, सीधा होता सर्प।।
28
मानवता सबसे बड़ा, जग में भवि है धर्म। साध लिया ये तो स्वतः,उत्तम होंगे कर्म।।
29
कर बुलंद ख़ुद को समझ,सबके हैं भगवान। करते वो सबपर कृपा, निर्धन या धनवान।।
30
ग़ुस्सा होता नाक पर,लालच में रख ध्यान। विष बाहर का बेअसर,भीतर का बलवान।।
31
कथनी-करनी है अलग, जिनकी मेरे ईश। न्याय करेंगे किस तरह, ‘भवि’ वो न्यायाधीश।।
32
दामन अपना देखिए, अपना भी किरदार। केवल कहने से नहीं, जाता भ्रष्टाचार।।
33
लेखन हो जिनका विविध, बनो उन्हीं के शिष्य। उत्तम गुरु के साथ ही,उत्तम बने भविष्य।।
34
चलती जिससे सृष्टि है, उस पर ही अब शोक। ‘भवि’ बेटी के जन्म पर,क्या अच्छी है रोक।।
35
कितना भारी नाम हो,कितनी ऊँची ज़ात। किसको भला कुकर्म से,जग में मिली निजात।।
36
कटु वचनों से क्या कहीं,बनती है कुछ बात। बिगड़े,मीठे बोल से,सुधरेंगे हालात।।
37
ख़ुद ही ख़ुद को कह रहे,तुम ज्ञानी-विद्वान। दुनिया दे आदर तुम्हें,भवि है वो सम्मान।।
38
बचे कैमरे से मगर, ये सोचें श्रीमान। कहाँ ईश की दृष्टि से,ओझल है इंसान।।
39
धनदौलत यश कुछ नहीं, ‘भवि’ आएगा हाथ। तू कर्मों पर ध्यान दे,जो जाएँगे साथ।।
40
शिष्य मिले अच्छा तभी, बढ़ता गुरु का मान। चहुँदिश उसके ज्ञान का,होता है सम्मान।।
41
पहले जैसी अब कहाँ, पर्वों में झंकार। अब तो हैं बस नाम के,तीज और त्यौहार।।
42
स्वच्छ हवा-पानी नहीं, दूषित हृदय विचार। करें देव भी किस तरह,अर्घ्य आज स्वीकार।।
43
जन्नत का दर था कभी, भवि हर घर का द्वार। मगर जहन्नुम हो गया,अब सारा संसार।।
44
होठों पर छाई हँसी, अंतस रोता पीर। भवि उसकी मजबूरियाँ, देतीं सीना चीर।।
45
अपने कर्मों पर करें, दिल से सभी विचार। असभ्यता के रोग का,तब होगा उपचार।।
46
डिग्री प्रतिभा तब तलक,'भवि' समझो बेकार। जब तक है इस देश में, आरक्षण की मार।।
47
अहंकार ने खा लिया, उसका सारा ज्ञान। वरना रावण था बड़ा, भवि ज्ञानी-विद्वान।।
48
बूँद-बूँद विश्वास से,बनती है पहचान। पलभर में कोई कभी,होता नहीं महान।।
49
झूठे उस इंसान को,शायद नहीं गुमान। कौन बचा भवि ईश की,लाठी से इंसान।।
50
फल अनाज पानी हवा, शुद्ध नहीं कुछ आज। 'भवि' कैसे इस हाल में,जीवित रहे समाज।।
51
पूजन करते राम का, रघुकुल से अंजान। वचन निभाते भवि नहीं, तुम हो मृतक समान।।
52
सोने सी काया हमें, देते हैं करतार। मिट्टी करते हैं हमीं,ये स्वर्णिम उपहार।।
53
मँहगाई से ज़िंदगी,किसकी है दुश्वार। थिरक रहा हर हाथ में,भवि मोबाइल यार।।
54
तन के सुख में इस क़दर,झूम रहा संसार। मन के सुख की बात अब, ’भवि’ करना बेकार।।
55
निर्भर मन की दौड़ पर,सारा जोश-उमंग। मन हारा तो जानिए,भवि जीवन बेरंग।।
56
राधा सोचे किसलिए, दुनिया का डर लाज। उसके दिल पर एक बस,मोहन का ही राज।।
57
जीवन का भवि देखिए, दर्शन बिल्कुल साफ़। करनी अपनी भोगना, ईश करें क्यों माफ़।।
58
कृपा सभी पर कीजिए, ईश हमेशा आप। सद्गुण सबको दीजिये, करे न कोई पाप।।
59
धूप सेंकना-रेडियो, चाय और अख़बार। मोबाइल में खो गया,जाने क्या-क्या यार।।
60
तू चन्दा मैं चाँदनी,पावन अपनी प्रीत । ऐसे में दिल झूमता, पाकर तुमसा मीत ।।

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