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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



दोहे


अर्जित पाण्डेय


 
 सांझ घनी है जानकर,क्यों नही बढ़ते पग
 रूप सलोना देखकर ,पास आते है ठग

लुटा लुटाकर व्यय किया,समय हुआ बलवान
भूले बिसरे गीत बन,विचरत है धनवान 	 
 

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