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वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम) , 2018



उपन्यास अंश


डॉ. दीपिका सगटा जोशी 'ओझल'


"यात्रियों से खचाखच भरी रोडवेज की बस, कच्ची सड़क पर घुमावदार मोड़ से गुजरी तो झटके से बेखबर तृष्णा अनजाने ही दीपांशु के कंधे पर ढह सी गई. नई नवेली पत्नी का स्पर्श पा युवा दीपांशु का मन रोमांचित हो उठा और तृष्णा हड़बड़ा कर स्वयं में सिकुड़ सी गई.

तृष्णा ने खुद को संयत करते हुए खिड़की से झांककर ब|हर देखा, एक विशाल पहाड़ को काटकर बनाई गई इस घुमावदार सड़क पर दौड़ती बस जब तेज़ी से मोड़ पर पहुँचती तो एक ओर पहाड़ों के विशालकर शरीर में उगे शूल समान उभरे पत्थर और दूसरी ओर गहरी पथरीली खाई, तृष्णा सहम उठी उसने सम्भलते हुए अगली सीट की पीठ पर लगी हुई लोहे की चढ़ को मजबूती से पकड़ लिया.

............ बस मोड़ पर से गुज़र चुकी है, शायद यही बताने का प्रयास कर रही हैं तृष्णा की नथ में लटकती नन्ही बुँदकियाँ, लेकिन तृष्णा!!! वो तो पहुँच गई है इन पहाड़ों से जुड़े अपने बचपन की यादों में........"

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हिय प्रांगण में उपजीं, पनपी चिर कल्पित अभिलाषाओं की श्रंखला बढ़ती ही चली जा रही थी मगर अब तक एक भी इच्छा वास्तविकता की परिधि के भीतर नहीं आ पाई थी. अपनी नन्ही सी जिंदगी से ढेरों उम्मीदें लगाई थी मैंने. बहुत ऊँची थी मेरी ख्वाहिशों की इमारते, कभी कभी ये भ्रम होने लगता कि हिम शिलाओं की भांति उन बहुमंज़िली अट्टालिकाओं के शिखर ध्वस्त होकर अपने पीछे एक मौन अवसाद के कोहरे में कैद करते चले जा रहे हैं मुझे..

समझ नहीं पा रही थी कि लोगों द्वारा वर्णित जीवन की कौन सी परिभाषा स्पष्टतया सार्थक रूप का प्रतिनिधित्व करती है.जीवन के हर मोड़ पर सकारात्मक पहलू ही विचारती आई थी मैं हर क्षण मगर इधर कुछ समय से न जाने क्यों सकारात्मकता नामक तत्व पूर्णत काल्पनिक सा लगने लगा था.

हमारे इर्द गिर्द हर ओर कुंठा, निराशा, वेदना का ही शंखनाद है और हम मायूसिओं के बियाबान में काल्पनिक अभिलाषाओं को खोजते रह जाते हैं . इंसान वही पाना चाहता है जो उसे कभी मिल नहीं सकता और उस चीज को पाने कि तरंगमयी कल्पना के चंद लम्हों को खुशिओं का नाम दे दिया जाता है वस्तुतः सुख, दुःख,ख़ुशी और गम सिर्फ हमारी कल्पना की उपज है.

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