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वर्ष: 3, अंक 48,नवम्बर(प्रथम)  , 2018



पुस्तक-समीक्षा :
'सोने का हार'


ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”


दादा-दादी से कहानी सुनना बच्चों का शगल होता है. कहानी से उन्हें सीख, समझ और आनंद की प्राप्ति होती है.यही वजह है कि बड़े लोग भी कहानी कहना और सुनना पसंद करते हैं.

कहानी में आनंद कथ्य से आता है. कथ्य में छूपा कथानक इसे ओर आनंददायक बनाता है. इसी से आनंद की अनुभूति होती है. अब क्या होगा ? की जिज्ञासा इन कहानियों की विशेषता होती है. इसलिए कहानियां सभी को लुभाती है.

ऐसे ही बच्चों को लुभाती कहानियों के एक संग्रह का नाम है— सोने का हार. डिमाई आकार , बड़े अक्षर, साफसुथरे और अच्छे कागज पर रंगीन आवरण के साथ छपी यह पुस्तक बहुत ही लुभावनी है. आवरण चित्र बरबर बच्चों को अपनी ओर खींचने की क्षमता रखता है.

संग्रह में कुल 16 कहानियां संकलित है. कहानीकार के अनुसार— ये कहानियां एक तरफ संकट के समय चतुराई और आत्मविश्वास के साथ मुकाबला करने तथा देशसेवा, ईमानदारी, बूढ़े व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति जैसे गुणों का विकास करेगी.

दूसरी तरफ झूठ, लालच और चोरी जैसी गलत आदतों से दूर रहने की सीख और प्रेरणा देगी. इन्हीं गुणों को ध्यान में रख कर कहानीकार ने अपने कथानक पर कहानियों का सृतन किया है. कहानी का तानाबाना बहुत सुंदर है. इन की भाषा सरल और प्रवाहमय है. चित्र कहानी के अनुरूप व आकर्षक बनाए गए है.

बच्चों के लिए एक उपयोगी संग्रह है. 85 पृष्ठ की पुस्तक का मूल्य बच्चों के हिसाब से 499 रूपए कुछ ज्यादा है. इसे कम किया जाना चाहिए. ताकि ये अपनी सामग्री के अनुरूप बच्चों में अपनी जगह बना सकें.


पुस्तक: सोने का हार
कहानीकार: डॉ पंकज वीरवाल 'किशोर' 09530470925
pankajveerwal@yahoo.com.au
प्रकाशक—बुक बजूका पब्लिकेशन
info@bookbazooka.com
रूपए: 499

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