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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



तमाशा मज़ेदार न था


सलिल सरोज


    
वो खरीद लेता था सबके आँसू बेधड़क
वो इस ज़माने के लिए अभी समझदार न था

कुछ तो कमी थी जो तू किसी की न हो सकी
तेरा हुश्न कातिल तो था पर ईमानदार न था

जनता कैसे रुके सियासती महफिलों में
"साहेब" के भाषण में सब था , फिर भी असरदार न था

माँ अरमान बेचती रही हर गुजरती रात के साथ
पर कोई बच्चा उन जाएगी रातों का कर्ज़दार न था

बच्चियाँ लूट ली जाती है बीच बाज़ार में
और देखने वाले कहते है कि तमाशा मज़ेदार न था
 

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