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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



और क्या जलाना है


डॉ० अनिल चड्डा


    
जो शै अपनी नहीं, उसे ही तो पाना है,
मुँह फेर कर जाने वाले को बुलाना है। 

मुहब्बत का असूल मत पूछिए जनाब,
कदम-दर-कदम हमको धोखा खाना है। 

इक तरफा हवा चले जिस शहर में,
उस शहर की ओर हमें क्यों जाना है। 

दुआ क्यों करते हों लंबी उम्र के लिए,
अभी और क्या हमने गम उठाना है।  

जलते ही रहे हम ताउम्र तुम्हारे कारण,
बाद मरने के अब और क्या जलाना है।  
 

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