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वर्ष: 3, अंक 48,नवम्बर(प्रथम)  , 2018



ऑनर किलिंग:
समाज का एक घिनौना चेहरा


शामिख फ़राज़


हिंसा का भाव जानवरों और इंसानों दोनों में है. हालाँकि जानवर अपने समाज के दूसरे जानवर का शिकार नहीं करता, लेकिन इंसान जानवर से भी आगे निकल गया. इंसान इंसान का ही शिकार कर रहा है. इंसान और जानवरों की हिंसा का जिक्र मैं इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि लगातार पिछले कुछ सालों में ऑनर किलिंग की काफी खबरें सुनने को मिली हैं. हम तो वह लोग हैं जो सिर्फ इन्हें पढ़ते हैं, लेकिन कुछ वह लोग भी होते हैं जिन्होंने इन चीजों को सहा होता है, बर्दाश्त किया होता है.

वर्ष 2014 से 2016 के बीच दो साल में ऑनर किलिंग के करीब 288 मामले दर्ज किए गए. 2014 और 2015 के बीच देश भर में इनकी संख्या में करीब सात गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2015 के आंकड़ों के अनुसार 2014 में ऑनर किलिंग के 28 मामले सामने आए थे, जो 2015 में बढ़कर 251 हो गए. ऑनर किलिंग के सबसे ज्यादा 168 मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए. इसके बाद गुजरात में 25 और मध्य प्रदेश में 14 मामले सामने आए. ऑनर किलिंग के 192 मामलों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-302 के तहत और 59 मामलों को धारा-304 (आपराधिक मानव वध) के तहत दर्ज किया गया. 2014 में ऑनर किलिंग के मामले में मध्य प्रदेश सबसे ऊपर था. इसके बाद पंजाब और महाराष्ट्र थे.दिलचस्प बात यह है कि 2014 में ऑनर किलिंग के मामलों में दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्यों के नाम नहीं थे. लेकिन 2015 में ऐसा नहीं हुआ. केरल में ऐसे पांच, आंध्र प्रदेश में दो और तमिलनाडु व तेलंगाना में एक-एक मामले सामने आए हैं. 2015 में प्रेम प्रसंग और अवैध संबंधों की वजह से क्रमशः 1,379 और 1,568 लोग मारे गए. उत्तर प्रदेश और गुजरात प्रेम संबंधों के चलते हत्या के मामले में सबसे ऊपर रहे. 2015 में इस वजह से उत्तर प्रदेश में 383 और गुजरात में 122 लोग मारे गए. बिहार में प्रेम संबंधों की वजह से 140 लोगों की हत्या हुई.

एनसीआरबी के मुताबिक 2015 में देश में हत्या की कुल 32,127 घटनाएं हुईं। हालाँकि एनसीआरबी के आंकड़ों पर कई बार सवाल उठते रहे हैं. तमाम आकलनों में कहा गया है कि राज्य सरकारें कानून-व्यवस्था में अपने प्रदर्शन को बेहतर दिखाने के लिए मामलों को दर्ज करने से परहेज करती हैं.

गोया ऑनर किलिंग ना हो गई, किसी को थप्पड़ मारना हो गया, किसी को धक्का देना हो गया. लोग क्यों नहीं समझते कि इस तरीके से हम इन मुश्किलों को हल नहीं कर सकते। इन समस्याओं का समाधान नहीं निकाल सकते। अगर कोई कुछ गलत करता भी है तो उस गलत को सही के खिलाफ नापने का जो पैमाना है, उस पैमाने के हिसाब से तय होना चाहिए कि वह इंसान कितना गलत है और वह इंसान किस सजा का हकदार है और इस सजा को तय करने का हक़ सिर्फ और सिर्फ कानून का होना चाहिए न कि समाज का.आमतौर पर समाज में, संस्कृति में और हर जगह यही बात पढ़ाई व समझाई जाती है कि अगर आपको किसी चीज से कोई दिक्कत है तो आप उस चीज को बातचीत से ही सुलझा सकते हैं. कहीं भी किसी का कत्ल कर देने से कोई हल नहीं निकलता है, लेकिन समाज या संस्कृति की बताई गई इन बातों के ऊपर हावी हो जाता है हिंसा का नैसर्गिक भाव. खुद को दुसरे से ताक़तवर दिखाने का भाव।


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