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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



दुकानें


सुरेश सौरभ


 
हाथ जोड़े
आंखें मूदें
कुछ लोग
उनसे
जो खुद ईश्वर
के नाम पर
अपनी दुकानें
चला रहे हैं
ऐसे रंगे भगवानो 
की चक्की में 
कब तक ?
पिसती-लिथरती
रहेगी जनता
यह प्रश्न लिए
कलम मेरी मौन है।
मैं पूछता हूं
ये दुकानदार कौन है ?		 
 

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