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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



जन्मदिवस है आपका


शुचि 'भवि'


    
ओ कर्मयोगी!
तारों में भी सबसे अव्वल ही
दुनिया आपकी होगी
देश हित में जीना
देश हित करते ही
मर जाना
मस्तिष्क आपका था
अद्यतन ज्ञान का
भरपूर खजाना

आपसा दूजा कोई कैसे होगा
देशप्रेमी आपसा कौन मिलेगा
जिसने गीता-कुरआन को
एक सा ही पूजा

नमन मेरा करिये स्वीकार
कुछ अंश आपके पाकर
मैं भी तो करूँ 
यह भवसागर पार...

सुनो
तुम कहो या मत कहो
जो आया है 
वो चला ही जायेगा...

रोता आया सबके जैसा ही
हँसता खिलखिलाता चला गया
उम्दा कर्मों का अपने
जखीरा छोड़ गया
याद कर उसको
नम आँखे 
मैं करती हूँ
ईश करे कलाम सी ही
मौत मुझको भी मिले
कर्म पूरे कर अपने
कूच करूँ जब दुनिया से
तोपों की न सही
अपनों की सलामी
मुझे मिले
 

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