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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



कविता तब भी उपजती है ...


मुरलीधर वैष्णव


   
कविता सिर्फ क्रौंचवध पर ही नहीं उपजती
वह वहां भी जन्म लेती है
जब पुलिस रिपोर्ट के अभाव में
डाक्टर द्वारा इलाज न करने से 
फुसाराम का इकलौता बेटा
दम तोड़ देता है

बिजली सी कौंधती है कविता 
जब झील में बत्तखों की जगह
कन्या भ्रूण के शव
तैरते नजर आते हैं

सिसकती है वह 
जब बच्चों से भरी स्कूल-बस
शराबी चालक की लापरवाही से
उफनती नदी में गिर जाती है

और चीत्कार करती है कविता तब तो
जब एड्सग्रस्त वैश्या
अपने संसर्ग से
दर्जनों को सक्रंमित कर
प्रतिशोध वश अट्टहास करती है

मित्रों !
मेरी कविता फिसल रही है
मुट्ठी में बंद बालू रेत सी
भटक रहा हूं मैं
बदहवाश सा
हमारे अपने बनाए बियाबान में
किसी अमृत कलश की तलाश में 
 

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