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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



करूं कुछ ऐसा.....


मुरलीधर वैष्णव


   
करूं कुछ ऐसा		
जुगनूं करें गश्त गुलशन की
अंधेरी रातों में			
जब उल्लुओं के षडयंत्र से 
हमला हो फ़ज़ां पर ख़ज़ां का		
बड़े ततैयों का बने जांच आयोग
दर्ज करें वे बयान		
पंख जले भौरों तितलियों के
और निर्णय दें कि
कभी नहीं उजड़ सकता		
हौसलों का यह बाग़बां			
				
करूं कुछ ऐसा
मिले कविता में मुझे एक शब्द
जो हो टीपू की तलवार
प्रताप का भाला
वेताल सा हठी हो वह
ब्रह्मास्त्र सा सटीक
सुखा दे जो आतंक का सागर
भर दे आलोक की गागर

करूं कुछ ऐसा			
नींव के पत्थरों में दफ़न शहादत
उगे एक नया सूरज बन
बह कर आए गंगा यमुना में 
हरिश्चंद्र का सच

कपिल मुनि का तप
समा जाए वह हमारे सीने में
घुल जाए किसान के पसीने में 
ताकि लहलहा सके जमीर की फसल
खिल सके संस्कारों के फूल

करूं कुछ ऐसा
कि यकायक फूट जाए मेरे भीतर 
एक झरना अल्हड़ मस्ती का
परिंदों के पंखों पे सवार हो
उतर आए नई भोर
बच्चे की खिलखिलाहट में डूब जाए
मंत्रों और आयतों का शोर
गमलों में उगा सकूं हीर राझें
खेल सकूं कान्हा संग होली
रचा सकूं हर आंगन में गीतों की रंगोली
 

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