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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



असीम हूं मैं


मुरलीधर वैष्णव


   
आकाश में उड़ती चील को
ट्रेफ़िक हैड कांस्टेबल ने रोका
‘किधर जा रही हो
इधर नो एन्ट्री ज़ोन है‘
चील उसके चारों ओर
चक्कर लगाती हुई बोली
‘मैं अपने शिकार के पीछे जा रही हूं
काट लो चालान मेरा
और भेज देना नोटिस मेरे घौंसले पर‘

मुम्बई की मछली को
कराची के तट पर पूछा गया
‘कहां है तुम्हारा वीजा-पासपोर्ट‘
हंसकर बोली वह
‘मेरी आत्मा के संदूक में पड़े हैं
मुझे काट कर ले लो उन्हें‘

बारामुला के झरने से गिरा
एक काला पत्थर
उस पार के दरिया तक 
लुढ़कते-लुढ़कते गोल हो गया
वहां वज़ू कर रहे  मौलवी ने पूछा
‘कौन हो तुम‘
वह बोला ‘वहां तो शिवलिंग था
यहां ज़र्रा हूं काबा का‘

कल शाम एक तेज़ पुरवाई
उड़ा लाई अपने साथ सीमा पार के 
अल्लानूर कीसातसौ छियासी 
नम्बर की कटीपतंग
नहीं गिरने दिया मैंने उसे ज़मीन पर
सजा रखी है आज भी उसे मैंने 
मेरी ढाणी के उस ढाळिये में
जहां करता हूं मैं सजदा
दिन में पांच बार

 

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