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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



दुर्गा विदाई


लवनीत मिश्रा


  
बेटी रूप धर आई दुर्गा, 
छोड़ आई ससुराल, 
ढोल मंजीरे धरा बजे,
जब जननी करे कल्याण,
चार दिवस की पावन बेला,
घर घर आनंद छायो,
तरह तरह के पाक बनाकर, 
बेटी भोग लगायो,
साज श्रृंगार कर दुर्गा का,
कहे करो आराम,
जीवन भर तो हे! जगजननी,
तनिक नही विश्राम, 
आज दिवस आया दशमी का,
विधाता हृदय कठोर,
नवमी की बेला ना बीते,
ना देखू दशमी भोर,
अभी हृदय तो भरा नही,
ना कर ही पाया सेवा,
हाल चाल पूछा ही था,
ना भोग लगाया मेवा,
तनिक दिवस रूक जाऔ जननी,
नयना नीर बहाए, 
कैसे तुझको विदा करू,
हृदय समझ ना पाए।
 

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