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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



निगाहें


कुंदन कुमार


    
है वासनामय निगाह मुझपे 
पड़ रही है हर घड़ी 
संगी कहता मुखड़ा ढक ले 
अंग - अंग बरछी फेंक रही 

चहुंओर खून ही खून उड़े 
घायल मन हरपल तड़प रहे 
मुंह मोड़ ज्वलित अग्नि में कैसे 
छोड़ इन्हे पग पलट चले 

बस तेरे एक भाव के खातिर 
मिथ्या दबे स्वाभिमान के खातिर 
सहत्र दिलों में जख्म हरे जो 
कह दूँ कैसे हर दर्द को काफ़िर 

असंख्य ह्रदय में अरमान जो पले 
अनिमिष नयनों में छवि जो जले 
पूर्ण विभा अब बांध मैं घुंघरू 
फिरूं बन नर्तक नभनग्न तले 

छोड़ चलूँ आडम्बर तेरा 
तोड़ चलूँ बेड़ी का बसेरा 
त्याग करूँ परिवेश मेरे जो 
खड़े हैं तेरे मद का अँधेरा 

रक्त सने हर आश जो बिखरे 
प्रेम के सुन्दर बाग़ जो उजड़े 
समेट चलूँ भर कोमल अंजुरी 
लपेट चलूँ मरहम की सूरी 
 

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