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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



ज़िंदगी


जय प्रकाश भाटिया


  
काली काली सड़को की तरह
कही स्पॉट कही ऊबड़ खाबड़
इंसान के कर्त्तव्य और कर्म की तरह
और मन के विचारो की तरह
एक दूसरे को काटती हुई
कुछ उलझी हुई कुछ सुलझी हुई
आंधी पानी तूफ़ान धूप झेलती हुई,
भारी भरकम बोझ सहती हुई,
चुप चाप चली जा रही है
यहाँ से वहां ,न जाने कहाँ से कहाँ .
कौन सी सड़क पर कौन सा वाहन
कौन सी फरियाद कौन सी ज़रुरत
सब कुछ संचालित है
ज़रुरत के "रिमोट कंट्रोल " के हाथ,
और सब को मंज़िल तक पहुंचाती,
यह सड़के
उस मज़बूर इंसान की ज़िदगी की तरह,
जिसकी एक सड़क है परिवार
और दूसरी सरकार,
दोनों को बराबर झेलता है आदमी --
इन सड़को की तरह
कर्म और कर्त्तव्य में उलझता ,
और कभी टकरा जाता है वाहन
मन के द्वन्द विचारों की तरह
और हार जाता है ज़िंदगी
सड़क पर पड़े किसी निर्जीव
अजनबी की तरह..
कुछ पल के लिए अवरुद्ध होती है सड़क
फिर चल पड़ती है ज़िंदगी
कर्त्तव्य और कर्म की राह पर
ऐसे तैसे किसी भी तरह
 

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