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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



विजयादशमी


कवि जसवंत लाल खटीक


  
कल मैं बैठा - बैठा सोच रहा था ,
क्या लिखू विजया दशमी है कल ।
क्या लिखू श्री राम पर और अब ,
क्या लिखू रावण द्वारा किए छल ।।

हमसब मिलकर दशहरा मनाते है  ,
और रावण के पुतले को जलाते है ।
आजकल राम के रूप में हर कोई ,
लंकापति रावण को तीर चलाते है ।।

पुतले तो हजार जलाते है हर वर्ष ,
पुतले नहीं अपनी बुराई जलानी है ।
अगर लंकेश के पुतले ही जलायंगे ,
तब तो कहानी हरसाल दोहरानी है ।।

अब कलयुग में घर-घर में रावण ही ,
राम का ही मुखोटा पहनकर बैठे है ।
खुद सीता भी सुरक्षित नहीं अब तो ,
लक्ष्मण स्वयं सीताहरण कर लेते है ।।

रावण ने तो फर्ज निभाया भाई का ,
बहन के अपमान का बदला लिया ।
अब भाई ही बहन को मार देते है ,
राखी के बन्धन का सम्मान किया ।।

कितनी मर्यादा रखी होगी रावण ने ,
तभी थी सीता की इज्जत सुरक्षित ।
आज गली-गली में राम फिर रहे है ,
फिर भी नहीं है यहां नारीयां रक्षित ।।

रावण को जलाना कोई फर्ज नहीं है ,
सबको जलाने है नकारात्मक विचार ।
हमको आगे बढ़ने का संकल्प लेकर ,
मिटाना चाहिये सब तरफ से भ्रष्टाचार ।।

"जसवंत" करे अरदास आप सबसे ,
अपने अंदर के रावण को जलाओ ।
रामराज  फिर से आ जाएगा बस ,
पहले अपनी बुराई पर तीर चलाओ ।।
 

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