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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



मन मन रावण


डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा 'द्रोण'


   
चाहे कितना भी तुम खुश हो लो
चाहे कितने भी रावण फूंको
जबतक अंतरमन का रावण 
हम नही  खत्म कर पाएंगे,
तब तक हम न सुरक्षित और
तबतक न कोई हम 
अपने ही घरों में खुशहाल हो पाएंगे।

यहां हर घर में रावण जिंदा है
सबका मन उछिप्त और
सबका हुआ रक्त गन्दा है,
सदियों की परंपरा मिट रही यहां
सब रिस्ते नाते खत्म हुए।

देखो नित दिन देहरी पर 
गूंजता अट्टाहास और चीख पुकार
सत्य की जगह असत्य पर 
होती चहु ओर जय जय कार
नारी की शक्ति हो रही क्षीण है।

हरदम देश की सीमा में दुश्मन
घुसने का करता रहता प्रयास
नही आदेश मिलता सेना को
इसलिए हमसब हैं रहते हतास
वह नित दिन करता है वज्रपात।

सीने को छलनी करदेता
हम सभी तमाशों के गुलाम
कत्ल करते देखो यह खुलेआम
यहां सब हैं रावण रहा न कोई राम
मन का रावण नही मरेगा तो 
एक दिन ऐसे ही धीरे धीरे 
जर जमीन जोरू सब होंगे गुलाम।	 
 

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