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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



जीवन जीलो


डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा 'द्रोण'


   
आओ सब जी लें जी भरके
मन की मुरादे पूरी कर लें
रात की काली घटा घनेरी
कल सुबह सुहानी आयेगी।

आपस में हिल मिल सब जाओ
रंजो गम मिल सब दूर करो
मन की बगिया हरी बनालो
दिल की कलियाँ मुस्काओ।

सुघड़ सुनहरे सपने  लेकर
तुम चिंता करना दूर करो
नए नए सपनो को चुनकर
नित नए रंग हर रोज भरो।

सुंदर सुंदर सपनो से तुम
प्रेम के मीत बनालो तुम
तभी सुखी से जी पाआगे, 
हरदिन  बड़ा सुखद होगा।

वरना आज  न जी पाआगे
कल को किसने देखा है
कल का दिन कैसा बीतेगा
वो कब किसने जाना है।

घर के सब लोगो को लेकर
सैर सपाटे रोज करो
कभी कभी बच्चे बनकर भी
मन की मस्ती खूब करो।

देखो तब दिन कैसा होगा
मनके चच्छु खोलो तुम
छोटे छोटे बच्चों की फिर
मन की बगिया सींचो तुम।

घर परिवार खुशहाल बनेगा
सबकुछ अच्छा पाओगे
हँसो हंसाओ जमकर खाओ
जीवन खुशहाल बनालो तुम।		 
 

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