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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



चाहत सी है


अमरजीत टांडा


 
चाहत सी है
आँखों में कोई ख्वाब उतरे जादू सा
लोरियां हों दादी कीं
सितारे से जेबें भरें 
फूल गिरें नंनी सी मुस्कान से
रात भरी हो कंचों से
जब तू होगी ख्वाबों में 
चन्दा से क्या लेना
चांदनी की चादर में से
डूबता सूर्य दिखाई दे
बगुलों की नज़र
मछलियों की आँख में हो
और मैं बैठा उडीकूँ तुझे
बीच के किनारे पाँव डाले 
दर्पण जैसे सपने में
तू आऐ
तो पाँव सोच कर रखना
धीरे आहिस्ता से
पाँवों से आवाज हूई तो
ख़्वाब टूट सकते हैं बच्चों के
कांच से होते हैं सपने
टूट जाऐं तो उम्र भर नहीं बनते
तिडके ख़्वाब टूटे खिलौनें से
कौन खेलेगा जनाब
एक बच्चे की निंदिया
टूटने से लाखों ख़्वाब मर जाते हैं
		 
 

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