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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



वो किनारा मिला न था


देवी नागरानी


  
ठहराव ज़िन्दगी में दुबारा मिला न था 
जिसकी तलाश थी वो किनारा मिला न था

हरगिज़ उतारते न समंदर में कश्तियां
तू फ़ान आया जब भी इशारा मिला न था

हम ने तो खुद को आप संभाला है आज तक
अच्छा हुआ किसी का सहारा मिला न था

बदनामियां घरों में दबे पांव आ गईं 
शोहरत को घर कभी भी, हमारा मिला न था
 
खुशबू हवा और धूप की परछाइयाँ मिलीं
जिंका हक़ीक़तों से कोई वास्ता न था

आगाज़ करती रात का मैं भी सफ़र का क्या 
रौशन करे जो शाम, सितारा मिला न था

खामोशियां भी दर्द से ‘देवी’ पुकारतीं 
हम-सा कोई नसीब का मारा मिला न था		 
 

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