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वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर(प्रथम) , 2018



हम पागल हुए


अनिरुद्ध सिन्हा


 
अपनी ही खुद्दारियों से क्या ज़रा घायल हुए
हर गली, कूचे में चर्चा है कि हम पागल हुए 

खिड़कियाँ खामोश हैं सब आहटें सहमी  हुईं 
क्या वजह है चील कौवे गिद्ध सब चंचल हुए 

मौसमों  के आइने  में  खंजरों  के अक्स थे
आज भी ताज़ा हैं दिल में हादिसे जो कल हुए 

काग़ज़ी  पौधे यहाँ  इतने  लगाए हैं कि अब
दफ़्तरों में  फ़ाइलों के हर तरफ़  जंगल  हुए 

प्रेम के कुछ इस तरह होते थे अपने ही मिज़ाज
आँख  से  टपके  हुए  आँसू  भी  गंगाजल हुए

 

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