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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

रसम

शबनम शर्मा

छुट्टियों के बाद स्कूल में मेरा पहला दिन था। नीना को सामने से आता देख मुझे अचम्भा सा हुआ। वह स्कूल की पी.टी. अध्यापिका है। पूरा दिन चुस्त-दुरुस्त, मुस्काती, दहाड़ती, हल्के-हल्के कदमों से दौड़ती वह कभी भी स्कूल में देखी जा सकती है। आज वह, वो नीना नहीं कुछ बदली सी थी। उसने अपने सिर के सारे बाल मुंडवा दिये थे। काली शर्ट व पैंट पहने कुछ उदास सी लग रही थी। कुछ ही समय में पता चला कि इन छुट्टियों में उसके पापा की मृत्यु हो गई थी। सुनकर बुरा लगा। शाम को मैं करीब चार बजे उसके घर गई। उसने मुझे बैठक में बिठाया। पानी लाई व मेरे पास बैठ गई। पूछने पर पता चला कि उसके पिता की मृत्यु हृदय गति रूकने के कारण हुई थी। रात का समय था, वह उन्हें अस्पताल ले गई जहाँ डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। घर आकर उसने अपने रिष्तेदारों को पिता जी मृत्यु की सूचना दे दी। सुबह पूरा जमघट लग गया। सवाल कि संस्कार पर कौन बैठेगा? चाचा के 3 बेटे थे। तीनों खिसक लिये। समय का अभाव था। नीना की दो बड़ी बहनें शादीषुदा थी, उनके बच्चे व पति भी व्यस्त थे। वह 10 दिन बैठ नहीं सकते थे। लाष को उठाने से पहले यह कानाफुसी नीना तक पहुँच गई। वह माँ के पास बैठी थी। उसने आँसू पोंछे व पिछवाड़े वाले ताऊजी से कहा जो रात से उनके साथ थे, ‘‘ताऊजी, मैं करूँगी पिताजी का अन्तिम संस्कार, मैं बैठूँगी सारी पूजा पर।’’ सबके दाँतों तले अंगुली आ गई। पर नीना ने किसी की परवाह न की। कंधे पर सफ़ेद कपड़ा रख कर, सबसे पहले अपने पापा की लाष को कंधा दिया व शमषान तक पूरी विधिपूर्वक सब कार्य किया। बताते-बताते उसकी आँखें कई बार नम हुई। बोली, ‘‘मैडम, मेरे पापा उकसर कहते थे मेरी दो बेटियाँ, एक बेटा है। मुझे क्या पता था कि आज...........’’ मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘‘नीना, मुझे तुझ पर गर्व है।’’


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