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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

लौट आए पिता

रामदयाल रोहज

रात 9 बजे का समय, वर्मा फ्लोर मिल की कान के पर्दे फाङने वाली घर्र घर्र की आवाज | चक्की कपङे की सूँड से सफेद महीन आटे से फटाफट थैले भर रही है जैसे कोई बुढिया बच्चों को भोजन परोस रही हो | चाँद की दूधिया चाँदनी में आटे के थैले और बाटों के वजन को सन्तुलित कर लगातार झूलता तराजू और जीतू आटे के हिसाब किताब में व्यस्त|आले में रखे लीरी बंधे रेडियो पर बजता हुआ ये गीत - लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में |

धन्नाराम ने अपने दोनों आटे के थैले तुलवाकर ऊँटगाङी में रखा और रूमाल में लपेटा सौ रुपये नोट निकालकर पिसाई के पैसे चुकाए | अचानक उसकी नजर एक पन्द्रह सोलह साल की लङकी पर पङी जो हाथ में झोला लेकर चौकी से नीचे खङी थी |धन्नाराम चौंक गए |इतनी रात गए अकेली लङकी ! यह लङकी चक्की वाले की तो नहीं हो सकती क्योंकि उसके तो सिर्फ दो लंगूर है | तो कौन हो सकती है ?

धन्नाराम अभी भी दूर खङा सोच रहा था |

लङकी ने जीतू से कुछ कहा परन्तु जीतू ने अपने दाएँ हाथ से ना का इशारा कर दिया |लङकी अब भी वहीं खङी निहौरे कर रही थी | धन्नाराम से रहा नहीं गया | पास आकर बोले- " किसकी बेटी है गुङिया ?"

लङकी मुस्कुराते हुए बोली- "आप मुझे नहीं जानते ताऊजी ! मैं तो आपको जानती हूँ | आप मीरा के पिताजी है, मीरा मेरे साथ पढती थी|"

"बेटा मैंने तुम्हें पहचाना नहीं |"

"ताऊजी मैं बलवान की बेटी हूँ कौशल्या |" "बेटा इतनी रात को लङकी का घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं है | वक्त बहुत खराब है |"

यह सुनकर लङकी कहने लगी- "ताऊजी पिताजी को तो आप जानते ही है चौबीस घंटे शराब के नशे में धुत रहते है | घर में आटा नहीं था इसलिए आटा लेने आई थी |"

"अब जल्दी से आटा लेकर घर जाओ बेटी |"

"जीतू अंकल ने मना कर दिया |"

"अरे ! भई जीतू लङकी को आटा तोलकर दो , कब से खङी है बेचारी |"

"अंकलजी पीछे से भी इनकी काफी उधार पङी है अब मैं उधार नहीं दूँगा |इसका बाप तो गलियों में पङा रहता है। मेरे पैसे कौन देगा ?"

"इसे तू दो किलो आटा दे दे | ये पैसे न दे तो मुझसे ले लेना |" जीतू ने बङबङाते हुए आटा तोलकर दे दिया | लङकी भी घर चली गई और धन्नाराम भी |

धन्नाराम को देर रात तक नींद नहीं आई | सोच रहा था एक हट्टे कट्टे आदमी की जवान बेटी दो किलो आटे के लिए गिङगिङाती फिरे यह अच्छी बात नहीं है | बलराम मेरे बचपन का दोस्त है | उसे समझाना चाहिए ,हो सकता है मान जाए |

सुबह ही धन्नाराम मेङी में धूपबती करके बलराम के घर आया | बलराम ने आदर सत्कार किया |

"भैयाजी आज मेरे पास कैसे आना हुआ |" बलराम ने अभी तक पेग नहीं लगाया था |चारपाई के नीचे बंद बोतल जरूर रखी हुई थी |

धन्नाराम ने चारपाई पर बैठकर बीङी सुलगाई और जलती हुई तीली को फेंकते हुए बोले- "हाँ तो बलराम आजकल क्या कामधन्धा कर रहे हो |"

बलराम थोङा सा हिचकिचाकर बोला - "भैयाजी आजकल तो कोई काम चलता ही नहीं है |बेकार ही बैठे हैं |"

इस बात पर धन्नाराम को गुस्सा आ गया |

"भलेमानुष लोगों को तो काम करने वाले नहीं मिल रहे और तू कहता है काम नहीं मिला ? पसीना आता है पसीना | घरवाली कमाती है और तू दारु पीकर गलियों में पङा रहता है | तेरी बेटी जवान हो गई है तुम्हे कोई चिन्ता है ! बेटी दो सेर आटे के लिए गिङगिङाए और उसके बाप को जरा सा भी तरस नहीं आता ! तुम बाप नहीं हो दुश्मन हो दुश्मन |"

यह सुनकर बलराम की आँखों में आँसू आ गए |

"बस करो भैया बस करो | मैं बहुत बङा पापी हूँ | मैंनें ही कौशल्या की माँ के गहने चुराकर बेचे थे | मैंनें ही वो डेढ क्विंटल गेहूँ बेची थी जिसे कौशल्या व उसकी माँ मजदूरी करके लाई थी | सच पूछो तो मैंनें पानी गर्म करने का देगचा भी बेच दिया | ये बेचारी दिनभर खेतों में काम करती है और नहाने के लिए परात में पानी गर्म करती है | मैंनें सब कुछ दारु में नष्ट कर दिया | इतना ही नहीं कौशल्या की माँ को लंगङाकर चलते देख रहे हो मैंनें ही इसके घुटने पर डाँग मारी थी |"

खङा होकर कौशल्या के पास जाता है "बेटी मुझे मारो | मैं तो आप सबका अपराधी हूँ | हाय ! राम मैं तो कौशल्या को भी बेचने की सोच रहा था | हाय! मेरा ये पत्थर दिल फट क्यों नहीं जाता", और फूट फूट कर रोने लगता है|

तब धन्नाराम ने कहा - "बलराम यह अच्छा हुआ कि तुमने पश्चाताप की अग्नि में अपने अन्दर बैठे राक्षस को जला दिया | लेकिन तुमने अपराध किया है इसकी सजा तुम्हे भुगतनी पङेगी |"

"भैया मैं हर सजा भुगतने को तैयार हूँ |" और सिर नीचा करके बैठ गया |

"तो सुनो - तुम्हे आजीवन ...शराब का ... त्याग करना होगा |"बलराम कुछ नहीं बोला उसने चारपाई के नीचे रखी बोतल को उठाया,गौर से देखा और दाँत पीसकर बोला - "तूने मेरा सब कुछ बर्बाद कर दिया |"

बोतल को जोर से चारपाई के पाए पर मारकर बोतल के टुकङे टुकङे कर दिए |फिर बोला- "आओ बेटी कौशल्या ! देखो ! मैंनें इस राक्षसी का अंत कर दिया | "

कौशल्या रोने लगती है। बलराम का भी गला भर आया |कौशल्या दौङकर बलराम के पास आई और बलराम ने उसे अपने गले लगा लिया |

कौशल्या रोते रोते कह रही थी - "देखो ताऊजी ! आपकी कृपा से मेरे खोए हुए पिताजी लौट आए हैं |"


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