मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

भारत माता (पिरामिड)

डॉ. सुनील कुमार परीट

तू मुझे काबिल समझती इस कदर जान लुटाउँगा ये माँ तुझे सलाम तू मेरे तन में दिलों जां में बसी है अब सिर्फ और सिर्फ तेरा जुनून का नशा तू सदा तैयार सबकुछ लिए हाथ में अपने सपने सपूतों के खातिर तू सदा देती है धीरज से सांत्वना हमे चाहे हार जीत आगे लगे रहना माँ तेरे ये ऋण हम कैसे चुका सकते जान हाजिर है ये कदमों के नीचे


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें