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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

अपने सपने

डॉ. सुनील कुमार परीट

जो चाहा वह नहीं मिला पर अनचाहा वही मिला। सच पराये तो पास आये पर अपने दूर चले गये॥ तन्हाई में तडपता रहा दिल की आह सुना नहीं। खामोशी जिन्दगी में छायी ये सपने चूर हो गये कहीं॥ भरी दुनिया में अकेला आसपास था भरा मेला। धडकने थम सी गयी आत्मा भटकती ही रहीं॥ अपने सपने छोड दिये रुह को मुक्ति दिलाना है। अब भरोसा सिर्फ उसपे दिल से हरिनाम जपना है॥


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