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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

टूटा दिल हमारा

रवि प्रभात

ऐसा टूटा दिल हमारा न आँख रोइ न लब मुस्कराया आँसू पी गया मैं अपने पर लब से कुछ निकल न पाया बहुत करता था प्यार उससे बस एक बात ही ऐसी कर गई जहाँ चढ़नी थी परवान दोस्ती दूरी में बदल गई कैसे करें उन से बात जब परछाईं से भी दूर रहते हैं अब दिल क्या मिलेंगे कभी जब हाथ भी नहीं मिलते हैं कभी न भूलूँगा वो पल जो साथ में बिताये थे हॅसे थे रोये थे कभी पर साथ ही दिन बिताये थे दिन बदला धरा बदली बदल गए सारे व्यवहार नदी के दो छोर पे खड़े हैं जैसे हों हम अनजान


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