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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

चूल्हा

ओम प्रकाश अत्रि

सबसे अच्छा है वह चूल्हा और साथ ही बड़ा भाग्यशाली है जो माँ के हाथों से मिट्टी के गीले लोओं से आकार दिया जाता है । नित-रोज माँ के हाथों का मिलता है उसे स्पर्श , ताजे पानी में मिट्टी मिलाकर माँ के हाथों से वह रोज धोया जाता है । अपने सिर पर रखकर बटलोई भात की , भूखे की भूख को वह दूर भगाता है । जेहन में अपने आग को रखकर सहता है आंच को , और साथ ही धुएं को भी सहनकर वह रोटियां पकाता है । आलीशान घर हो या कोई झोपड़-पट्टी हो संन्यासियों की कुटिया हो या कि फुटपाथ हो वह हर जगह रहकर नया जीवन दिलाता है। अन्दर हो या बाहर हो जाड़ा हो या गर्मी हो चाहे जितनी पुर-जोर आषाढ़ की बारिश हो वह बारहों महीना जलने को तैयार रहता है । लोगों की आँखों की चमक बच्चों की किलकारी चूल्हे में बसती है, न जले किसी एक दिन तो सबकी निगाहें चूल्हे पर अटकती हैं । सचमुच चूल्हा ही लोगों के पेटों को भरता है धन्य की छाती है उसकी जो अपने उदर में लकड़ियों को भरकर जीवन भर जलता है ।


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