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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम) 2017



कोपल की लाचारी

हरिहर झा

जंगल में  मंगल है, 
कच्ची कोपल की लाचारी 
बन्दर की चौपाल जमा 
पपिहा गाये दरबारी। 

रामराज्य  की 
टांग खींच कर 
कुत्ते  मांगे वोट;   
गिद्ध नोचते, करते  
जिन्दा लाशों से विस्फोट;
बालक रोता रहे 
ना मिल पाये जीवन की भीख;
कोई मरे या कोई जीवे , 
सुने ना  कोई चीख;
 
चलदी कोई मासूम  
झपटे लंपट व्यभिचारी। 

चुगने की आशा में  
रामू  मन ही मन  हरषाये; 
भई निराशा, मनवा रोवे  
फूल क्यों  कुम्हलाये;
फुलवारी में 
बगैर लछ्मी के  
बीज मिले न खाद; 
चप्पल घिसे  रोज रोज की 
पहुँचा ले कर फरियाद;  
किसकी कुंडी खड़काये 
द्वार न खोले दरबारी।


तिनका लिये 
आया पंछी   
सिर पर गीर गई  गाज़; 
रिक्त घोसला बिखरे दाने, 
माली है नाराज; 
छिपाये मुँह, 
किराया बाकी, 
पूछे आती लाज; 
गिड़गिड़ाये,माफी मांगे पर, 
घेर रहे हैं बाज;   

माथा नीचा,  दुष्टों का 
माने खुद को आभारी।   

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