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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम) 2017



मुफ्त की मिली थीं

अशोक बाबू

मुफ्त की मिली थीं 
दो रोटियाँ
चवा लीं 
अब क्या करूँ ?
हाथ चलाने ही पड़ेंगे 
सोचता हूँ 
कर लूँ नौकरी 
या खोल लूँ दुकान 
या चला दूँ कलम 
बन जाऊँ कवि
किन्तु कवि को कौन जानता
पहचानता 
हर घर में कवि 
मौहल्ले में कवि 
शायद वे भूखे ही रहते होंगे 
या कलम छोड़ 
दूसरा करते होंगे 

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