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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



कोमल सी हो तुम मधुप्रिये


डॉ० अनिल चड्डा


कोमल सी हो तुम मधुप्रिये
मेरा पथ काँटों से भरा
साथ मेरा दोगी तुम कैसे
कभी है नभ से मिली धरा

पग-पग चलना हुआ है दूभर
व्यथित रहे बोझिल मन दिन भर
तपती धूप, है जलते पाँव
पता नहीं कहाँ मिलेगा ठाँव
यूँ तो तुम लगती हो मुझको
जीवन में शीतलमयी सुरा
पर सोचो तुम आज तलक
कभी है नभ से मिली धरा

दूर क्षितिज तक नजर दौडाएँ
स्वप्न इंद्रधनुषी नजर में आएँ
पर क्या उनको पकड़ सकें हम
व्यर्थ वो हमको हैं तड़पाएँ
मैं हूं सपना, तुम हो हकीकत
साथ है अपना जरा-जरा
आज तलक दुनिया में बोलो
कभी है नभ से मिली धरा

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