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वर्ष: 2, अंक 32,  मार्च(प्रथम), 2018



बेपनाह


जनकदेव जनक


आंखें खुली. टिमटिमाता हुआ नीम अंधेरा आंखों में समा गया. उस वक्त चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा था. पता नहीं कमरे में था या कूप भवन में. इतना स्मरण जरूर था कि मैं अपने बिछावन पर लेटा था. झट से उठ कर बैठ गया.मोबाइल ऑन कर देखा तो रात के साढ़े तीन बज रहे थे. आज केस की तारीख है. इसी उधेड़बुन में रात ठीक से सो नहीं पाया था. सुबह उठ कर बस पकड़ने की हड़बड़ी तो रहती ही है. रात में सोते समय कमर में लपेटे लुंगी की पेच में पांच सौ रुपये का नोट रखा था,जो उस जगह अब नहीं था. यकायाक मन घबरा गया. दिल की धड़कने तेज हो गयी. शायद रुपये का नोट बिछावन पर गिरा हो, इसलिए मोबाइल की लाइट ऑन कर इधर उधर खोजने लगा. खोजते खोजते मन हार गया, लेकिन वह मिला नहीं. दिल टूटता जा रहा था. आंखें भींगती जा रहा थी. सुबह होने पर घर वालों को क्या जबाव दूंगा!

सुबह में रुपये खोने की बात अपनी पत्नी को बतायी. मेरी मुसीबत को वह तार गयी. बिना पैसा लिए छोटा भाई तारीख पर कैसे जा पायेगा. यह बात सोच सोच कर पत्नी भी व्याकुल होती जा रही थी. आखिर सुबह साढ़े छह बजे भाई आया. मेरे सामने खड़ा हो गया. इस उम्मीद के साथ कि मैं उसे तारीख पर जाने के लिए पैसे दूंगा. उसे देखते ही मेरा मन भावुक हो उठा. मैं भीतर ही भीतर रो पड़ा. मन किया जोर जोर से भोकार पारकरके रोऊं, ताकि मन में दबा गुब्बार निकल सके. भाई हत्प्रभ सा खड़ा था. मेरी मनोदशा का अवलोकन करने में लगा था. हम तीनों को एक साथ खड़ा देख आंगन खड़ी मेरी मां भी पास चली आयी और पूछ बैठी,‘ आखिर इतने उदास क्यों हैं बेटा,बात क्या है ?’घर की आर्थिक संकट में पैसे खोने की बात बताकर मै मां को और दुखित करना नहीं चाहता था. गुमशुम चुपचाप मां के सामने अपराधी की तरह सर झुकाये खड़ा रहा. क्योंकि रात उसी ने अपनीं चांदी की हसुली बंधक रख कर पांच सौ रुपये दिया था. आखिर में पत्नी ने सारी बातें मां को बता दी. मां तो आखिर मां होती है. सारी बातें सुनने के बाद बिना नाराज हुए मां ने कहा,‘ अभी हताश होने की जरूरत नहीं है. आगे और लड़ाई लड़नी है. तुरंत पैसा के इंतजाम करती हूं. ’

कुछ दिनों के बाद छठ महापर्व आया. उसके अगले दिन केस की फिर तारीख पड़ी थी. घर में फांका-कस्सी का आलम था. खेत से उखाड़े गये मूली को बाजार में ले जाने की तैयारी हो रही थी. ताकि उसे बेच कर तारीख का खर्चा निकाला जा सके. व्रत को लेकर मां उदास थी. क्योंकि छट महापर्व में ही पूरे घर का नया कपड़ा खरीदना पड़ता था. दो साल पूर्व मेरी शादी हुई थी. पत्नी के कपड़े भी फटकर तार तार हो गये थे.वह सौंदर्य की लघु सजीव प्रतिमा फटी लुगरी में किसी भिखारन की तरह लग रही थी. उसे देख कर अपने पर तरस आता था कि इतना बदकिसमत आखिर क्यों हो गया. क्या इसका जिम्मेवार जातीय जंग तो नहीं. दोनों पक्ष अपनी उन्नति और विकास का रास्ता छोड़ कर विनाश की राह पकड़े हुए हैं. मेहनत की गाढ़ी कमाई पुलिस, वकील व कोर्ट की अर्दली में फिजुल जा रहा है. लेकिन दोनों पक्ष को कौन समझाये! इसी उधेड़बुन में था कि उसी समय एक सब्जी व्यापारी आ गया. अ्च्छी कीमत में मूली उसे बेच दिया.कुल दो मन मूली का दाम उसने डेढ़ हजार रुपये दिया. व्यापारी के जाने के बाद मैं पास के चापाकल पर नहाने चला गया. थोड़ी देर बाद पुलिस वारंट लेकर पहुंच गयी. मुझे गिरफ्तार कर पुलिस जाने लगी तो मां दौड़ी दौड़ी वहां पहुंची. छठ व्रत की दुहाई देकर छोड़ देने की गुहार लगाने लगी. लेकिन दारोगा नहीं माना.

मैं जहां था वहीं था. लेकिन मेरा भावुक मन वहां नहीं था. वह भावनाओं के सागर गोते लगा रहा था. कभी चक्कर काटते भंवर में डूब जाता तो कभी लहरों पर मचलते हुए ऊपर आ जाता. गरीबी से मेरा पुराना नाता रहा है. गांवों में भूखमरी थी. खाने को भर पेट भोजन नहीं मिलता था. नोनी के साग के साथ कभी मकई की रोटी, तो नोनगोलवा साग के साथे मसुरिया का भात खा लेते थे. तियन-तरकारी के अभाव में मकई के भात के ऊपर नमक छिड़क कर मजे के साथ खाते थे. बाजरा, मड़ुआ, मकई आदि की रोटियां तो आज सपना के सामान है. लेकिन उस वक्त इन्ही अनाजों का भूंजा चबेना खा कर पानी पीते थे. रसोई में गेहूं की रोटी व चावल का भात तो दिवा स्वप्न जैसा था. मेरा ही नहीं अड़ोस पड़ोस के लोगों की एक ही स्थिति थी. खैर, नि:स्वार्थ बचनपन बड़ा ही मन मोहक और मधुर था. गरीबी ही थी तो क्या हुआ. किसे गरीबी का अहसास था! मेरे सहपाठियों को खाने पीने पर कम खेलने पर ज्यादा जोर रहता था. गांव के चाचा गाछी में दोल्हा पाती, गुली-डंडा, चिका, कबड्डी खेले में समय कट जाव. जब बड़का बाबूजी डंडा लेके चहेटते थे तो भाग कर अपने बथानी में पहुंच जाते थे. अक्सर पिटाई से दादी हमारी रक्षा करती थी.

बचपन पंख लगाकर उड़ रहा था. हम चिड़ियों की तरह नभ की ऊंचाइयां नापा करते थे बिल्कुल चिंता फिकिर से निफिकीर होकर. चिंता तब होने लगी जब मां के आंखों में आंसू ढलकते देखा था. वह आठ आठ आंसू बहा रही थी. मां को रोता देख मैं भी उससे लिपट कर रोने लगा था. मेरी नन्हीं नन्हीं आंखों में दर्द था. पड़ोसियों से मालूम हुआ कि बड़जतिया संगठन के शिबू ने रंगदारी के लिए गांव के कुछ लोगों पर हमला बोल दिया था. जिसमें मेरी मां भी जख्मी हुई थी. घर में जो अनाज था, उसे उठा ले गये थे. उनका किसी ने विरोध तक नहीं किया था. किसी की पीठ पीछे भी जुबान नहीं हिली कि एक तो पीड़ितों के घरों में खाने के लाले पड़े हैं तुम्हारी मांगें कैसे पूरा करेंगे. अरे, लूटना ही है तो दो नंबर के धंधेबाजों को लूटो, जो कभी दाल, कभी प्याज कभी तेल के नाम पर समाज और देश को आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं. धिक्कार है ऐसी दादागीरी की! यही सलूक अगर कोई सिरफिरा तु्मारी मां-बहनों के साथ करे तो कैसा लगेगा. ‘सब दिन न होत एक सामाना.....’ इंसान हो या शैतान उसे यह वाक्य भूलना नहीं चाहिए. गांव में इतना कौन बोल सकता था. सभी डरपोक थे. हमलावरों के जाने के बाद भले तीसमार खां बनते थे.,लेकिन उनके सोझा प्रतिवाद करने का साहस नहीं था. कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो उन्हें उनकी बुजदिली से उबार सके. उनमें हिम्मत और साहस का बीज बो सके. मैंने उसी दिन प्रण कर लिया था कि हमलावरों को माफ नहीं करना है. ग्रामवासियों के मरे जमीर को जगाना है. ताकि वे स्वयं अपनी हिफाजत और समाज की रक्षा कर सके.

अपने फसलों तथा अनाज की सुरक्षा को लेकर लगभग दो दशक बाद हमने हमलावरों को जबाव दिया. दोनों तरफ से अस्त्र-शस्त्र चमकाये गये. ग्रामीणों ने उन्हें बुरी तरह से रगेदा. लेकिन हमारे हुंकार को स्थायनी प्रशासन ने कातिलाना हमला करार दिया. उस जंग में शामिल लोगों पर कई दफा लगा दिया गया. हमने एक बार रंगदारों को छू दिया तो धर पकड़ के लिए गांव में थाना पुलिस पहुंच गयी. हमारे खिलाफ जेल का दरबाजा खुल गया. कानून अंधा हो गया.इंसाफ चीख उठा. गरीबों की आवाज कोई सुनने वाला नहीं है. उनकी आवाज भी है तो मूक, शब्दहीन, चुपचाप, नि:शब्द! वह सदियों से निरंकुश लोगों द्वारा सताया जाता रहा है. बेबसी में तड़पता रहा है. किसी ने उसकी आवाज भी उठाई तो बेरहमी से दबा दी गयी.ताकि कोई बोल नहीं सके. ग्रामीणों के साथ भी ऐसा ही हुआ. घटना के दूसरे दिन ही मेरे साथ कई जेल के सलाखों के पीछे ढकेल दिये गये. जेल में बंद हमारे साथ कई नाबालिग बच्चों के कारण अदालत ने घटना को तरजीह नहीं दिया. बेल पर हम जेल से बाहर आ गये.

घर आने के बाद जब अपने खेतों पर गये तो काठ मार गया. जहां के तहां खड़े रह गये. फसल गायब थी. रंगदारों ने उसे साफ कर दिया था. ऐसा लगा जैसे किसान के सामने उसका जवान बेटा मर गया हो. अब आन बान और शान की लड़ाई बढ गयी. बात बात पर दोनों तरफ हमला करना अब आम हो गयी थी. एक दूसरे पर मुकदमा होने लगा. इंसानीयत व हैवानियत के बीच मुकाबला था. पनाह खोजते खोजते लोग खुद बेपनाह हो गये थे. जिसका मौत के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं थी.


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