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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

नई पृथ्वी

सुनील चौधरी

वे मेरे पास आए उन्होंने नई पृथ्वी बसाई थी बोले - बहुत ही प्रेम है वहाँ पर बहुत ही चैन है वहाँ पर खुशियाँ ही खुशियॉ हैं वहाँ पर मैंने भी कह दिया जाओ लौट जाओ अपनी पृथ्वी पर जाकर बना दो मंदिर, मस्जिद ,चर्च और गुरुद्वारे फिर लड़ते रहना हर दिन हर रात हर सप्ताह हर महीने और जीवन भर इतना सुन वे चले गए और आज तक नहीं लौटे । डरता हूँ कहीं उन्होंने सच में तो मेरी बात नहीं मानी थी ।


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