साहित्यकारों की वेबपत्रिका
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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 57, मार्च(द्वितीय), 2019

बसन्त गीत


कवि आनन्द सिंघनपुरी


 

हौले-हौले रे घुमड़ बासन्ती पवन,
लेकर अहसासों का मीठा छुअन।
मस्ती भरी अंगड़ाई, कलियां भी देख-देख मुस्काई।
झूम उठे भौरें ऊंचे गगन।।

शमाँ देख कर बदला है करवट,
माथे पर हैं सिकन की सलवट।
जुबां पर घुल रहे हैं गीत मल्हार
खिल रहें है दिलों पे हंसी का गुब्बार 
झूम उठे हैं हो मगन।।

अमरईय्या बौराये खिलखिलाये पलाश,
पँछी चहचहायेएकरते तलाश।
पसार बाह सरसों बुलाये अपने पास
चहके पतछड़ पाकर मधुमास,
पल्लवित विटप बना मधुबन।।

नव किसलय लगा है डाल-डाल
गूँथते गीतों की स्वर लहरी माल।
रसिकों के दिल में भरता बहार
धरा भी आतुर करने अँकवार।
सजते सरगम,रमते मन।


  

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