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वर्ष: 3, अंक 56, मार्च(प्रथम) , 2019



उसका चरित्र


राजेन्द्र कुमार शास्त्री 'गुरु'


       
मुस्कुराती हुई
चंचल मन सी 
जब वो आती थी,
संग नई उमंगे 
भरके लाती थी
कहता था जब उसे 
'तुम चुप रहो'
वह दो मिनट में सब
कह जाती थी।

लहरता हुआ उसका
वो  आँचल
हिरनी जैसी वो 
प्यारी आँखे
लफ़्जों की  उसे  
क्या जरुरत थी
वो तो नयनों से
सब कह जाती थी।

आज भी सोचता हूँ मैं
क्या कहूं मैं उसे?
दगाबाज़ या धोखेबाज़
पर डर लगता है,
इस बात का 
मैं क्यों उसे बुरा कहूँ
वह तो मेरे हर ज़ख्म पर
मरहम लगाती थी।
 

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