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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 63, जून(द्वितीय), 2019

मंगलसूत्र

शबनम शर्मा

तमाम रसमों-रिवाज़ निभा, एक बड़ा जमघट बना शोर-शराबे के माहौल में सबकी मौजूदग़ी में पहना दिया उसने मेरे गले में चंद काले मोतियों का मंगलसूत्र, जो सदैव याद दिलाता मायके का विछोह व सारी उम्र की उम्रकैद एक अजनबी संग। चाहते मिटाना मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, ढल जाऊँ, बन जाऊँ मैं उनके घर की उस पुरानी दहलीज़ सी, जिसमें आई पुश्तों से कई बहुएँ, गई कई दादियाँ। मैं शायद बन भी गई उस दहलीज़ का पायदान, जिस पर सिर्फ पाँव ही पोंछे छोटे से बड़े तक ने, मेरा मंगलसूत्र घिस गया, हलकी पड़ गई उसकी टिकड़ी, मोती भी बदरंग हो गए, पर कभी शिकायत न की, क्योंकि ये कभी बदला नहीं जाता। सिर्फ एक सोच, मज़बूर करती मुझे काश कि उस दिन पहनाया होता किसी ने बाहों का मंगलसूत्र जो मुझे हर वक्त देता इक सकून इस घर को अपना कहने के लिये।


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