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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 63, जून(द्वितीय), 2019

जेठ की दुपहरी

रामदयाल रोहज

भीष्ण गर्मी धरती जलती निर्धूम भट्टे सी पेङों तले जलती छाया| खींप और आक के बीज ऊपर उङने लगे है रेशम के पंख लगाकर | धूलभरी आँधियाँ चली दरखतों की आँखें लगी लगातार रङकने नीचे से ऊपर तक धूल ही धूल है गलियों के दाँतों में किर किर ही किर किर चलती लू की लपटें पानी का भ्रम हुआ प्यासे हिरन दौङते बेचारे नदी तालाबों की सिकुङ रही काया डायन सी उचकी जेठ की दुपहरी


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