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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 63, जून(द्वितीय), 2019

ढाल-कवच तू माँ!

पुष्पा जोशी 'प्राकाम्य'

माँ एक मूरत है,प्यार और ममता की। माँ एक सूरत है,श्रद्धा और समता की।। त्याग,सेवा और समर्पण सब कुछ तू है माँ! माँ एक मूरत,,,,,,,,,,,,,,,,,,। माँ एक बन्धन है,रिश्तों से ऊपर का। खुशबू चन्दन है,व्योम और भू पर का।। प्रेमभाव और प्यार का दर्पण सब कुछ तू है माँ! माँ एक मूरत,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,। माँ एक शब्द है,जिसमें सृष्टि समायी। माँ की लोरियाँ, देवों को भी भायीं।। निर्मल-कोमल,मीठी-प्यारी,मन की सच्ची माँ! माँ एक मूरत,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,। सबके जीवन का अहम अंग है माँ। सबके कष्टों से लड़ती जंग है माँ।। नयी उम्मीदें,नई तैयारी,नवीन आशा माँ! माँ एक मूरत,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,। माँ एहसास है,जिससे दिल हंसता है। माँ के रिश्ते में,परमेश्वर बसता है।। ममता,करुणा,वात्सल्य का अतुल खजाना माँ! माँ एक मूरत,,,,,,,,,,,,,,,,,,,। विजय के सपनों की सच्ची आशा माँ। कीर्ति-यश पाने की इक अभिलाषा माँ।। मोह-माया,प्यार-त्याग की अमिट कहानी माँ! माँ एक मूरत,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,। पारब्रह्म ईश्वर की अनुपम रचना माँ। वेद और शास्त्रों की गुण और गरिमा माँ। प्रबल सूर्य के तेज किरण सी है चमकीली माँ। माँ एक मूरत,,,,,,,,,,,,,,,,,,,। जग का जीवन भी तुझसे खिलता माँ। हर सुख जीवन का तुझसे मिलता माँ। तू संरक्षक,तू अंगरक्षक, ढाल-कवच तू माँ! माँ एक मूरत,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,। खुशी के रास्ते सब तुझ तक जाते माँ। जब संघर्षों से हम थक जाते माँ। तुही पुकारे,तुही निहारे तुरही दुलारे माँ। माँ एक मूरत,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।


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