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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 63, जून(द्वितीय), 2019

कलयुगी बन जाइये

अजय एहसास

घोर कलयुग है भइये, समय के साथ चलिए कुछ बनों या ना बनों पर कलयुगी बन जाइये।। सारा हुनर कारीगरी, चालाकियां और होशियारी आपका अपना है सब, जब चाहें तब अपनाइये जब दूसरे की बात हो , मासूम सा बन जाइये कुछ बनों या ना बनों पर ,कलयुगी बन जाइये।। खुद न बंधना नियम से, बस दूसरों पर थोपिये तलवार नियमों की चले, जो मानें उसको भोकिये खुद पर जो लागू भी न हो, कानून ऐसे बनाइये कुछ बनों या ना बनों पर, कलयुगी बन जाइये।। बात ना कभी काटिए, सुन लीजिए खामोश हो कमियां बताओ सभी की, चाहें तुम्हारा दोष हो आपस में सब लड़ते रहे, बस नीति ये अपनाइये कुछ बनों या ना बनों पर कलयुगी बन जाइये।। पेमेन्ट कम हो काम हो, सम्मान हो और नाम हो बस काम अपना निकालिए, सन्नाम या बदनाम हो काम सब बन जाये, थोड़ी चापलूसी लाइये कुछ बनों या ना बनों पर कलयुगी बन जाइये।। वक्त की करवट को समझें, आप अब हैं नही बच्चे देखकर मुंह बात करके, आप भी बन जाये अच्छे गले मिलकर पीठ पीछे, छूरियां चलाइये कुछ बनों या ना बनों पर कलयुगी बन जाइये।। जो किया एहसास मैने, आपको सब बता दिया जो न कर पाया अभी तक, आपको वो सुझा दिया बात मेरी मानिए, इसको अमल में लाइये कुछ बनों या ना बनों पर कलयुगी बन जाइये।।


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