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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



दो जून की रोटी


कवि जसवंत लाल खटीक


  
दो जून की रोटी , के खातिर ,
अभागन माँ , जंगल में जाती ।
दुधमुँहा बालक , आँचल में ,
नंगे पैर ही , लकड़ी ले आती ।।
दो जून , की रोटी चाहिए ,
नहीं चाहिए , इन्हें पांच पकवान ।
कड़ी धुप में , चलते- चलते  ,
माँ ! करवा रही , स्तनपान ।।
हुँकार , भरी नारी शक्ति ने ,
उठाये परिवार का बोझ ।
घर की जिम्मेदारियो के लिए ,
लकड़ी ढोती , नारी हर रोज ।।
नहीं जरूरत , बुलेट ट्रेन की ,
ना चाहिए , मुझे कोई माल ।
पैरो में चप्पल , तन पर कपड़ा ,
हो जाउंगी , मै इनसे निहाल ।।
पसीने के , कतरे- कतरे को ,
बच्चा , महसूस करता होगा ।
माँ , के सुखद भविष्य की ,
प्रभु से , दुआएँ करता होगा ।।
माँ , तेरी अनमोल ममता पर ,
मै , अपार प्रेम ,लुटाऊंगा ।
बड़ा होकर , सपूत बन कर ,
दूध , का क़र्ज़ चुकाऊंगा  ।।
"जसवंत" करे ,पुकार "भगवन",
इनको भी दे , तू भरपेट खाना ।
ताकि , माँ ! को इस हालत में ,
पड़े नहीं , कभी जंगल जाना ।।  
 

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